Tuesday, December 15, 2009

कोसी अंचल : परिसीमा एवं इतिहास

कोसी अंचल से तात्पर्य कोसी नदी की विभीषिका का साक्षी रहे भू-क्षेत्र से है। मार्ग परिवर्तनशीला कोसी अपनी छाड़न धारा परमान से लेकर तिलयुगा तक हजारों वर्षों से बहती आई है और इन धाराओं के बीच के भू-क्षेत्र का निर्माण और ध्वंस करती रही है। इस दृष्टि से 1964 ई. में संपूर्ण तटबंध निर्माण के बाद निर्धारित कोसी के वर्तमान प्रवाह-मार्ग के पूरब के क्षेत्र को हम कोसी अंचल के नाम से अभिहित कर सकते हैं, जिसकी पूर्वी सीमा महानंदा नदी का प्रवाह-मार्ग है, जबकि दक्षिणी सीमा गंगा नदी का प्रवाह-मार्ग। अंचल की उत्तरी सीमा भारत-नेपाल की सीमा भी है। कोसी अंचल के इस सीमांकन में प्रशासनिक दृष्टि से बिहार के पूर्णिया और सहरसा प्रमंडल के अंतर्गत आनेवाले सात जिले शामिल हैं-कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, मधेपुरा, सहरसा और सुपौल।

चूँकि कोसी नदी का प्रवाह-मार्ग परिवर्तनशील रहा है, इसलिए भिन्न-भिन्न समयों में इस अंचल के भू-भाग भिन्न-भिन्न शासकों द्वारा शासित होते रहे हैं, क्योंकि कोसी के प्रवाह-मार्ग ने प्रायः राज्यों की सीमा-रेखा के रूप में कार्य किया है। प्राचीन काल में कोसी नदी का पश्चिमी हिस्सा कभी विदेह तो कभी अंग राज्यों का हिस्सा रहा है तथा वहाँ के शासकों द्वारा शासित हुआ है, जबकि इसका पूर्वी हिस्सा कालक्रम में कभी स्वतंत्र रहा तो कभी बंगाधिपतियों द्वारा शासित हुआ है। किसी-किसी काल में यह अंचल सम्मिलित शासकों द्वारा भी शासित हुआ है।

याज्ञवल्क्य प्रणीत 'शतपथ ब्राह्मण' (शुक्ल यजुर्वेद, अध्याय 1) की एक कथा के अनुसार आर्यों के एक दल ने विदेध माथव के नेतृत्व में अपने कुल पुरोहित गोतम रहूगण के साथ सरस्वती नदी के तट से पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान किया। वे लोग वैश्वानर अग्नि को सम्मुख रखकर उसके पीछे चलते हुए पूरब की ओर बढ़े। अग्नि सामने पड़नेवाले वनों को जलाते और स्रोत-नदियों को सुखाते हुए आगे बढ़ती गई, किन्तु हिमालय की ओर से आनेवाली अत्यंत बर्फीली नदी ‘सदानीरा’ तक आकर रुक गई, उसे सुखा नहीं सकी। मथवा के यह पूछने पर कि अब हम कहाँ जाएँ, अग्नि ने कहा-

”तस्या नद्याः प्राग्देशः सर्वोपि इदानीं ब्राह्मणवासः.....यतो वैश्वानराग्निनानास्वादितम् तस्तत्स्थानमपवित्रम (1-4/1-15) अर्थात् नदी के पूर्व देशों में सब जगह ब्राह्मण वास करने लगे हैं.....लेकिन वैश्वानर अग्नि द्वारा अनास्वादित वे स्थान अपवित्र हैं।

प्रतिष्ठित पुरातत्त्वज्ञ राखालदास बनर्जी और महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने सदानीरा की पहचान कौशिकी के रूप में की है। (इंडियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली, मार्च 1945)

इस प्रकार आर्यों ने कौशिकी (कोसी) के पश्चिमी तट पर पहुँचकर उत्तरी बिहार में तत्कालीन आर्यावर्त की पूर्वी सीमा निर्धारित कर दी और अपने राज्य को ‘स्वदेश’ की संज्ञा दी। कोसी के पूरब घने जंगल थे, भूमि उर्वर थी, लेकिन वहाँ आर्येतर जातियों का निवास था, इसलिए बढ़ती जनसंख्या के कारण वासयोग्य और कृषियोग्य भूमि के अभाव के बावजूद आर्यजन कोसी को पार करने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन पेट की भूख ने उन्हें ‘स्वदेश’ का परित्याग कर बंधु-बांधवों समेत बाल-बच्चों को कंधे पर उठा कोसी लाँघने को विवश कर ही दिया; और इस प्रकार आर्यजन वास के लिए प्रतिबंधित सीमा का अतिक्रमण कर पूर्वी क्षेत्र में कारतोया नदी तक फैल गए। 'हरिवंशपुराण' के रचयिता ने इसका बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है-

स्वदेशोभ्यः परिभ्रष्टा निःसारा सहबंधुभिः। नरा सर्वे भवष्यिन्ति तदाकालपरिक्षयात।। ततः स्कन्धै समादाय कुमारान विद्रुताभयात। कौशिकीं प्रतरिष्यन्ति नरा क्षुद्भयपीड़िताः।।

वेदपुराणशास्त्रों से प्राप्त राजनीतिक इतिहासवृत्त के अनुसार विवश्वान मनु के ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु ने कोशल राज्य की स्थापना की थी, जिनके दो पुत्रों निमि और नाभनेदिष्ट ने बाद में क्रमशः मिथिला और वैशाली राज्य स्थापित किए। पार्जिटर द्वारा तैयार प्राचीन भारतीय राजवंशावली के अनुसार मनु की पुत्री इला से पुरूरवा, नहुष, ययाति, अणु, पुरु आदि सुप्रसिद्ध सम्राटों की चंद्रवंशावली ने प्राचीन भारत में शासन किया। इसी चंद्रवंश में राजा अणु के पुत्र तितिक्षु ने आणव राज्य की स्थापना की थी,जिसे पुराणों में प्राच्य राज्य की संज्ञा दी गई है।

आणव राजवंशावली का सर्वाधिक प्रतापी राजा बली हुआ। बली का कोई औरस पुत्र नहीं था। राजा बली की स्वीकृति से रानी सुदेषणा ने नियोग द्वारा अंधे महर्षि दीर्घतमा से पाँच क्षेत्रज पुत्र पैदा किए, जो क्रमशः अंग, बंग, पुंड्र, सूक्ष्म या सुह्म और कलिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्होंने कालक्रम में अपने नामों पर पाँच राज्यों की स्थापना कर प्राच्य राज्य का विस्तार उत्तरी बंगाल और ओड़िशा तक फैला दिया। इतिहासकारों और पुरातत्त्वज्ञों ने अंग की वर्तमान पहचान पुराने भागलपुर प्रमंडल (जिसमें वर्तमान पूर्णिया एवं सहरसा प्रमंडल शामिल थे), पुंड्र की पहचान महानंदा नदी से कारतोया नदी के बीच के भूक्षेत्र, बंग की पहचान पुराने ढाका प्रमंडल, सूक्ष्‍म की पहचान वर्तमान पश्चिम बंगाल स्थित मुर्शिदाबाद-वीरभूमि के जिलों (राढ़ अंचल) तथा कलिंग की पहचान वर्त्‍तमान ओडि़शा के पूर्वोत्‍तर भू-क्षेत्र के रूप में की है।

रामायण-काल में भी कोसी अंचल अंग राज्य के अधीन ही था, जिसके राजा लोमपाद थे। राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ के लिए कौशिकी तट निवासी विभांडक गौतम मुनि के पुत्र ऋष्यशृंग की उपलब्धता के लिए अंगराज लोमपाद की ही सहायता ली थी। महाभारत-काल में कोसी अंचल अंग से स्वतंत्र कौशिकीकच्छ राज्य के रूप में वर्णित है, जिसके पश्चिम में मिथिला और पूरब में पुंड्र की अवस्थिति थी। युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के बाद पूर्वी राज्यों के दिग्विजय-अभियान के क्रम में भीम ने क्रमशः मिथिला और उसके उत्तर के सात किरात राज्यों, गंगा के दक्षिण स्थित मगध, अंग, मोदागिरि और झारखंड के पर्वतीय राज्यों, गंगा के उत्तर स्थित कौशिकीकच्छ के राजा महायश (महौजा) तथा उसके पूरब स्थित पुंड्रवर्द्धन के बलशाली राजा वासुदेव को पराजित कर बंग देश की ओर प्रस्थान किया था। पार्जिटर ने पूर्णिया जिला के कोसी नदी से महानंदा नदी के बीच के भूभाग को कौशिकीकच्छ माना है, लेकिन गौड़बंगाल के कुछ इतिहासकार इसके अंतर्गत मधेपुरा-सहरसा जिलों के पूर्वी भाग, सोनबरसा राज तथा महानंदा-गंगा संगम के सारे पश्चिमी भूक्षेत्र को शामिल मानते हैं। इस प्रकार महानंदा नदी के पश्चिम स्थित मालदह जिले का सारा क्षेत्र इसके अंतर्गत था, जो कि 1835 ई. में मालदह जिला-निर्माण के पूर्व तक पूर्णिया का ही हिस्सा था। भूगोलविद् नंदलाल दे ने भी अपनी पुस्तक 'ज्योग्राफिकल डिक्शनरी ऑफ एंशिएंट एंड मेडिवल इंडिया' में लिखा है कि वर्तमान पूर्णिया जिला ही प्राचीन कौशिकीकच्छ है, जिसमें त्रिवेणी-संगम तथा वराह क्षेत्र तक के पर्वतीय भूभाग भी सम्मिलित थे।(पृ. 161)

कालांतर में पुंड्रवर्द्धन के राजाओं ने अपनी सीमा का विस्तार करके कौशिकीकच्छ पर भी अपना आधिपत्य कायम कर लिया। तभी तो ऐतरेय ब्राह्मण (रचनाकाल: ई. पू. 1000-1500) में पुंड्रजनों को विश्वामित्र की संतान कहा गया है। पुंड्रवर्द्धन राज्य की उक्त अवस्थिति की पुष्टि बौद्ध स्रोतों तथा मौर्यकालीन (महास्थानगढ़, बोगरा से प्राप्त अभिलेख) एवं गुप्तकालीन (दामोदरपुर से प्राप्त बुधगुप्त एवं देवगुप्त के ताम्रलेख) अभिलेखों से भी होती है।

बुद्ध-काल में गंगा नदी के उत्तर कमला नदी और कोसी नदी के बीच का क्षेत्र अंगुत्तराप के नाम से जाना जाता था, जो अंग महाजनपद का हिस्सा था। गौतम बुद्ध (623-543 ई.पू.) द्वारा इस क्षेत्र की यात्रा के समय अंग शिशुनागवंशी मगधराज बिंबिसार (शासन काल 585-551 ई.पू.) के अधीन था। बुद्ध द्वारा अंगुत्तराप के ‘आपण निगम’ नामक स्थान पर महीने भर के प्रवास का प्रसंग मिलता है (मज्झिम निकाय, 2, 1, 4 तथा महावग्गो, 6, 5, 2, 15), जिसके अनुसार वे भद्दिया से गंगा पारकर आपण गए थे और जातिवन में ठहरे थे, जहाँ पोत्तलीय नामक गृहस्थ को दीक्षित किया था और केणियवाह ग्राम के केणिय नामक जटिल ने 1200 बौद्ध-भिक्षुओं को भोजन पर बुलाया था और मैरेय-पान कराया था। केणियवाह, जातिवन, आपण निगम और भद्दिया की आधुनिक पहचान क्रमशः सहरसा जिले के कंदाहा, देवनवन, वनगाँव और भित्तिया गाँव के रूप में की गई है।

बुद्ध द्वारा कोसी नदी को पार कर पूर्व देशों की यात्रा का कोई भी साक्ष्य हमें प्राप्त नहीं होता, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि उनके समय में कोसी का प्रवाह-मार्ग इसकी हइया धार अथवा इसके पूर्व की कोई अन्य धारा रही होगी। शिशुनाग राजवंश (642-413 ई.पू.) के बाद क्रमशः नंद राजवंश (413-322 ई.पू.), मौर्य-राजवंश (322-185 ई.पू.), शुंग-राजवंश (185-73 ई.पू.), कण्व-राजवंश (73-28 ई.पू.) और आंध्र-सातवाहन कुल (28-78 ई.पू.) प्रभुत्वशाली हुए, जिनका शासन अंग, मिथिला और पुंड्रवर्द्धन पर भी रहा। इसके बाद का गुप्त साम्राज्य से पूर्व तक का काल विदेशी आक्रमण और स्थानिक शक्तियों के उदय के कारण प्रायः राजनीतिक अस्थिरता का रहा है। भूगोलवेत्ता प्टोलेमी और मेगास्थनीज (भारत यात्रा: 315 ई.पू.) के मतानुसार महानंदा से पश्चिम गंडकी नदी तक के क्षेत्र में मुरुंड, किरात और भारशिव-नाग जनजातियों की उपस्थिति रही है। किसी केन्द्रीय नेतृत्व के अभाव में मिथिला और पुंड्र क्षेत्र में इन जनजातियों के शासन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। भारशिव-नाग वंश ने 320 ई. तक प्रायः 200 वर्षों तक शासन किया है। यत्किंचित शक-शासन भी इस क्षेत्र में अवश्य रहा होगा, अन्यथा शक संवत को यहाँ मान्यता न मिलती।

गुप्त काल (320-593 ई.) में उत्तरी बिहार दो भुक्तियों (क्षेत्रों) में बँटा हुआ था-तीरभुक्ति (प्रायः संपूर्ण उत्तरी बिहार) तथा पुंड्रवर्द्धन भुक्ति (वर्तमान सहरसा और पूर्णिया प्रमंडलों सहित उत्तरी बंगाल)। वृहद विष्णुपुराण (रचना काल: गुप्तोत्तर काल) के मिथिला खंड में तीरभुक्ति शब्द का प्रयोग करते हुए इसकी सीमाओं का निर्देश इस प्रकार किया गया है-पूर्व में कौशिकी, पश्चिम में गंडकी, दक्षिण में गंगा और उत्तर में अरण्य प्रदेश। इस स्पष्ट सीमांकन के रहते हुए भी यह दुःखद है कि मिथिला (तीरभुक्ति) की सीमा को पूर्व में महानंदा नदी तक ले जाने का दुराग्रह पाला जाता है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि कोसी का प्रवाह-मार्ग बदलते रहने के कारण वर्तमान कोसी अंचल के अनेक हिस्से कभी-न-कभी मिथिला के शासकों द्वारा अवश्य शासित हुए होंगे।

गुप्त साम्राज्य के पतन के वाद पूर्वोत्तर बिहार और असम-बंगाल के इस क्षेत्र में स्थानिक वर्चस्व की असंख्य लड़ाइयाँ लड़ी गईं और यहाँ राजनीतिक अराजकता का माहौल रहा। यहाँ तक कि हर्षवर्द्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद लगभग 75 वर्षों तक का इतिहास प्रायः तिमिराच्छन्न है। एक लंबे समय तक इस क्षेत्र में चले सत्ता-संघर्ष में परवर्ती गुप्तराजवंश, मौखरी राजकुल, पुष्पभूति (वर्द्धन) राजकुल, बंगाल का राजा शशांक, बांग-हुएन्-त्से (तिब्बती आक्रमणकारी), कामरूप-भूप हर्ष, कन्नौज-राज यशोवर्मन, कश्मीरेश्वर ललितादित्य मुक्तापीड़, पाल, प्रतिहार, राष्ट्रकूट, चंदेल, चालुक्य, चेदि (कल्चुरि) आदि भूपति शामिल रहे हैं। पाल राजवंश एक लंबे अंतराल (750-1197 ई.) तक जरूर शासन में बना रहा, लेकिन छीना-झपटी और लूट-खसोट बदस्तूर जारी रहे थे।

अंततः 1097 ई. में कोसी के पश्चिम मिथिला में नान्यदेव द्वारा कर्णाट राजवंश की स्थापना की गई। इस वंश के अंतिम शासक हरिसिंह देव (शासनकाल: 1307-1324 ई.) थे। नान्यदेव के पुत्र गंगदेव (शासनकाल: 1147-1187 ई.) के काल में कोसी का प्रवाह-मार्ग इसकी सउरा धार थी और यह तिरहुत (मिथिला) और बंगाल की सीमा रेखा का काम करती थी। इस समय बंगाल में सेन वंश का शासन था। 1324 ई. में गियासुदीन तुगलक की मिथिला-विजय के पश्चात् यहाँ क्रमशः दिल्ली, जौनपुर तथा पुनः दिल्ली के अधीन अर्द्ध-स्वतंत्र राजसत्ता ओइनवार राजवंश ने सँभाली, जो 1526 ई. तक राज करता रहा। इस वंश का सर्वाधिक लोकप्रिय राजा शिवसिंह (1413-1416 ई.) था, जिसकी कीर्ति की विरुदावली मैथिली कवि विद्यापति ने गाई है। इस दौरान कोसी के पूर्वी भाग पर बिहार-बंगाल के मुस्लिम शासकों का अधिपात्य रहा, जो दिल्ली के अधीन थे, लेकिन स्वतंत्र होने के लिए लड़ाइयाँ लड़ते रहते थे और यदा-कदा स्वतंत्र भी हो जाया करते थे। 1576 ई. में पूरी तरह बंगाल दमन के पश्चात् ये क्षेत्र मुगल सल्तनत के अधीन हो गए और बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी को हस्तांतरित हो गए। इसके बाद का कोसी अंचल का इतिहास प्रायः सुस्पष्ट और सुलेखित है।

4 comments:

  1. अच्छी रचना बधाई। ब्लॉग जगत में स्वागत।

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  2. नदी का इतना विस्तृत वर्णन, गज़ब......

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  3. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

    कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
    वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
    डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
    इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
    और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

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  4. etni saari jankari ek jagah pakar dhann ho gaya. eskeliye devender ko badai................

    BRAJESH

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